सिर्फ विपक्षी पार्टी में ही हैं भ्रष्ट नेता??
जैसे जैसे लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की छापेमारी और तेज हो रही है। हेमंत सोरेन गिरफ्तार हो चुके हैं लालू यादव और तेजस्वी यादव से पूछताछ हो चुकी है।आगे भी होने की संभावना है। अभिषेक बनर्जी से भी पूछताछ हो चुकी है। अरविंद केजरीवाल पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। चुनाव से पहले अभी विपक्ष के कई और नेताओं पर भी कार्रवाई होने की आशंका है। जांच एजेंसियों की इन कारवाई से यह साफ है कि भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में 'भ्रष्टाचार पर वार' को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश में है।अब तक बरामद हजारों करोड़ की नकदी को दिखाते हुए केंद्र सरकार इसे भ्रष्टाचार पर की गई अपनी कार्रवाई की सफलता के तौर पर जनता के सामने रख रही है। भाजपा इसे प्रधानमंत्री मोदी की ईमानदारी और भ्रष्टाचार को किसी कीमत पर बर्दाश्त न करने की नीति के तौर पर भी पेश कर रही है।
जांच एजेंसियों की इस कारवाई पर यह सवाल तो उठ रहे है कि क्या भ्रष्टाचारी केवल विपक्षी दलों में हैं?? सवाल यह भी उठता है विपक्षी दलों में रहते हुए जो नेता जांच एजेंसियों के रडार पर थे वह भाजपा में शामिल होते ही पाक साफ हो गए?? ऐसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। चाहे वह असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा हो या फिर महाराष्ट्र के वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजीत पवार, महाराष्ट्र के मंत्री छान भुजबल हो या फिर बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा हों या फिर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल हो या फिर बंगाल के मुकुल राय ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है यदि इसी तरह विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई होती रही, तो देश में लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा। ऐसा विपक्षी नेताओं का मानना है। विपक्षी नेताओं के अनुसार, यह विपक्ष को समाप्त करने की कोशिश है। उसका तर्क है कि सभी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के निशाने पर केवल विपक्षी दलों के नेता हैं। सत्ता पक्ष के किसी नेता पर कार्रवाई नहीं हो रही है, जो साबित करता है कि इस छापेमारी का उद्देश्य विपक्ष को कमजोर करना है।
सवाल यह भी है कि जनता इसमें से किस तर्क को स्वीकार करेगी- वह इसे भ्रष्ट नेताओं पर ईमानदार प्रधानमंत्री द्वारा की गई कठोर कार्रवाई मानेगी, या वह इसे विपक्ष को कमजोर करने की एक गलत कोशिश मानेगी?
मोदी सरकार के पिछले 10 साल के कार्यकाल पर नजर डालें तो ईडी और सीबीआई ने बीजेपी के एक भी बड़े नेताओं के यहां कोई कार्रवाई नहीं की है। कई नेताओं पर पहले से केस दर्ज हैं, जो फाइलों में खोया हुआ है। जिन राज्यों में बीजेपी कमजोर है, वहां पर ईडी-सीबीआई और आईटी को एक्टिव किया जाता है। फिर कई नेताओं को डराया जाता है। डर से जो बीजेपी में जाने को तैयार हो जाते हैं, उन पर कार्रवाई नहीं होती है। बाकी नेताओं पर ईडी और सीबीआई अपनी नजरें गड़ा लेती है।